Thursday, October 24, 2013

सपना मेरा टूट गया, सोना कहीं छुट गया

”सपना मेरा टूट गया, सोना कहीं छुट गया”
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बाबा ने कहा मंदिर में सोना (Sleep) है
सुनके सोती सरकार जाग गई

विपक्छ ने कहा सरकार जागती आँखों से सपने देखती है
सुनके बाबा की नींद में खलल पड़ गई

गेरुआ बाबा का मन आहत हुआ है
सुनके विपक्छ की नींद भाग गई

विपक्छ के सपने टूट सकते हैं
सुनके तीसरा पक्छ नीद मैं चलने लगा

तीसरा पक्छ मरा नहीं,  नींद मैं भाग रहा है
सुनके आम आदमी के दल को उनके सपने साकार लगे

पर डरता हूँ,  पक्छ-विपक्छ का सोना जागना
सुनके देश का सपना ही ना टूट जाए

और क्या सुनेंगे, हम/आप तो cattle class हैं
हमारी किस्मत मैं थोड़े ही ना सोना (Gold ) है

Tuesday, January 1, 2013


Female safety begins with safeguarding female foetus, lets come together for them and make 2013 Year of female safety

                       
टूटे सपने

माँ ढ़ेर सारे सपनों के साथ पल रही हूँ तेरे गर्भ में
क्या कहूँ कितने हसीन सपने आते हैं बाहरी दुनिया के सन्दर्भ में |

कितनी सुहानी होगी वो दुनिया जिसको सजाने आते हैं रोज सूरज, चाँद, सितारे,
यकीं है, मिलेंगी खुशियाँ,  सपने सारे सच होंगे हमारे| 

मेरी नन्ही उँगलियाँ चाहती है पापा की मुट्ठी का महफूज अहसास,
पता है दादी चूम लेंगी मेरे चाँद से दमकते माथे को लेकर पास|

भाई देगा सारे खिलौने मुझे,
जाऊँगी  स्कूल, मेरे ज्ञान का ज्योत और बढे|   

घोड़ी पे सजीला राजकुमार आएगा ब्याह के सुनहरी डोली में ले जाएगा,
रास्ते पे बिछेगी नए घर वालों की आँखे, पसार देंगी एक और माँ प्यार भरी बाहें|  

यकीं है उमड़ेगा स्नेह का बादल  चहुँ ओर,
नाचेगा मनमोर सम्मान की बारिश में सराबोर|

माँ मैं हो गई हूँ थोड़ी और बड़ी,
महसूस करने लगी हूँ बाहर के परिवर्तन को घडी घडी|

सूरज के उजाले, और गुनगुनी धुप का पता चलने लगा है अब, 
समझ जाती हूँ टीवी पर आ रहा है संगीत कब और समाचार कब|

ये बालिका वधु  की आनंदी  की पढाई  क्यों कर दी बंद, 
मेरे सपनो  का हकीकत  से कैसा है  द्वन्द्ध |

 माँ यह डॉक्टर ने दादी के कान में क्या कहा, 
उनका तुम्हारे और मेरे लिए अब पहले सा प्यार क्यों नहीं रहा| 

लगता है मेरे और तुम्हारे सपनों से उनके सपने अब मेल नहीं खाते, 
देखती भी नहीं तुम्हार्री ओर इधर से आते जाते| 

उनके चेहरे पे कुटिल सी मुस्कान है,
खतरे में शायद हमारी जान है|

जान बचाने की सपथ ली है ईस सफ़ेद चोगे के सैतान ने,
फिर क्यूँ पिला दी तुम्हे हलाहल ईस हैवान ने|

ये अँधेरा हो रहा है पल पल और गहन,
बुझ से रहे हैं हीरे से दमकते  नयन| 

माँ तू कर नहीं पाई कोई सार्थक प्रयास,
तेरी बेबसी का अहसासटूटने लगी  अब मेरी  सांस|
  
मेरी उँगलियों को क्यों नहीं मिला  पपा की मुट्ठी का सहारा,  
आने से पहले क्यॉ अधुरा रह गया सपना हमारा।

-- संजय स्वाधीन